जैसा कि सभी जानते हैं, कि वेद, पुराण एवं शास्त्र हमारी प्राचीन धार्मिक एवं सांस्कृतिक धरोहर है जिसमें अथाह ज्ञान का भंडार समाहित है। उसी धरोहर में से उपरोक्त शिव-पार्वती सम्वाद शिव पुराण एवं शिव परक वैदिक साहित्य से उद्यत है। जिसमें ‘‘ऊँ नमः शिवाय’’मन्त्र एवं रुद्राक्ष की महिमा का वर्णन किया गया है। इस शिव-पार्वती सम्वाद में मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति का सरलतम मार्ग बताया गया है। आशा है कि पाठकगण नीचे वर्णित शिव-पार्वती सम्वाद का पठन एवं पाठन तथा मनन कर लाभान्वित होंगे।

देवी पार्वती जी बोलीं -ः देवाधिदेव महादेव ! करूणा सागर ! प्रभो ! मुझ पर कृपा कीजिये। आप परम पुरूष हैं, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, और स्वतन्त्र परमेश्वर हैं। सबके स्वामी हैं। रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण से परे हैं। आप निगुर्ण भी हैं, सगुण भी हैं। हर ! मैं धन्य हूँ। मैंने बहुत वर्षों तक आपके साथ बिहार किया है। महेशान ! इससे में बहुत संतुष्ट हुई हूँ। हे देवेश्वर हर! अब तो मैं उस परम तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करना चाहती हूँ, जो कलिकाल में आपके भक्तों को सुख प्रदान करने वाला है तथा जिसके द्वारा जीव संसार-दुःख से अनायास ही उद्धार पा सकता है। हे नाथ ! कलियुग में जब सारा संसार धर्म से विमुख हो पापमय अन्धकार से आच्छादित हो जायेगा, वर्ण और आचरण संबंधी आचार नष्ट हो जायँगे, धर्म संकट उपस्थित हो जायेगा, सबका अधिकार संदिग्ध, अनिश्चित और विपरीत हो जायेगा, उस समय उपदेश की प्रणाली नष्ट हो जायेगी और गुरू-शिष्य की परम्परा भी जाती रहेगी। ऐसी परिस्थिति में आपके भक्त किस उपाय से मुक्त हो सकते हैं?, उसे आप बताइये, मुझ पर कृपा कीजिये।

महादेवजी ने कहा -ः हे देवि ! कलिकाल में मनुष्य मेरी परम मनोहर प्रणव सहित पंचाक्षरी विद्या ‘‘ऊँ नमः शिवाय‘‘ का आश्रय ले भक्ति से भावितचित्त होकर संसार बंधन से मुक्त हो सकते हैं। यदि कोई मनुष्य मानसिक, वाचिक और शारीरिक दोषों से दूषित कृतघ्न, निर्दय, छली, लोभी और कुटिल है वे भी यदि मुझ में मन लगाकर मेरी पंचाक्षरी विद्या ‘‘ऊँ नमः शिवाय‘‘ का लिखित एवं वाचिक जप करेंगे, तो उनके लिये यह मन्त्र ही संसार सागर से तारने वाला होगा। देवि! मैंने बारंबार प्रतिज्ञा पूर्वक यह बात कही है भूतल पर पतित हुआ मेरा भक्त भी इस पंचाक्षरी विद्या ‘‘ऊँ नमः शिवाय‘‘ के द्वारा संसार बंधन से मुक्त हो सकता है।

पार्वती जी बोलीं -ः महादेव ! यदि मनुष्य पतित होकर सर्वथा कर्म करने के योग्य न रह जाय अर्थात् अशक्त हो जाय तो उसके द्वारा किया गया कर्म नरक की ही प्राप्ति कराने वाला होता है। ऐसी दशा में पतित मानव इस ‘‘ऊँ नमः शिवाय‘‘ मन्त्र के द्वारा कैसे मुक्त हो सकता है?

महादेव जी ने कहा -ः सुन्दरि ! तुमने यह बहुत ठीक बात पूछी है। अब इसका उत्तर सुनो, पहले मैंने इस विषय को गोपनीय समझकर अब तक प्रकट नहीं किया था। यदि पतित मनुष्य मोहवश (अन्य) मन्त्रों के उच्चारण पूर्वक मेरा पूजन करे तो वह निःसंदेह नरकगामी हो सकता है। किन्तु पंचाक्षर मन्त्र ‘‘ऊँ नमः शिवाय‘‘ के लिये ऐसा प्रतिबन्ध नहीं है। जो केवल जल पीकर और हवा खाकर तप करते हैं तथा दूसरे लोग जो नाना प्रकार के व्रतों द्वारा अपने शरीर को सुखाते हैं, उन्हें इन व्रतों द्वारा मेरे लोक की प्राप्ति नहीं होती। परन्तु जो भक्तिपूर्वक पंचाक्षर मन्त्र ‘‘ऊँ नमः शिवाय‘‘ से ही एक बार मेरा पूजन कर लेता है, वह भी इस मन्त्र के प्रताप से मेरे धाम में पहुँच जाता है। इसलिये हे देवि ! तप, यज्ञ, व्रत और नियम पंचाक्षर मन्त्र द्वारा मेरे पूजन की करोड़वीं कला के समान भी नहीं है। मेरे पंचाक्षर मन्त्र में सभी धर्मों के भक्तों का अधिकार है। इसलिये वह श्रेष्ठतर मन्त्र है। पंचाक्षर मन्त्र के प्रभाव से ही लोक, वेद, महर्षि, सनातन धर्म, देवता तथा यह सम्पूर्ण जगत् टिके हुए है।

पार्वती जी बोलीं -ः देवाधिदेव महादेव इस पंचाक्षर मन्त्र ‘‘ऊँ नमः शिवाय‘‘ की उत्पत्ति किस प्रकार हुई है? कृपया विस्तार पूर्वक कहने की कृपा करें।

महादेवजी बोले -ः देवि ! मेरे जो पाँच मुख हैं और जिनके द्वारा मैं सृष्टि, पालन, संहार, तिरोभाव, और अनुग्रह ये पाँच जगत् संबंधी कार्य करता हूँ इन्ही में से मेरे उत्तरवर्ती मुख से ‘अकार’ का, पश्चिमवर्ती मुख से ‘उकार’ का, दक्षिणवर्ती मुख से ‘मकार’ का, पूर्ववर्ती मुख से बिन्दु का, तथा मध्यवर्ती मुख से ‘नाद’ का प्राकट्य हुआ इन सभी पाँचों अवयवों के एकीभूत होने पर वह प्रणव ‘ऊँ’ नामक एक अक्षर हो गया । यह एकाक्षर मन्त्र शिव और शक्ति अर्थात् हम दोनों का बोधक है। देवि ! इसी एकाक्षर मन्त्र से ही पंचाक्षर मन्त्र ‘नमः शिवाय’ की उत्पत्ति हुई । जो हमारे ही सकल रूप का बोधक है। तदोपरान्त इसी मन्त्र से गायत्री देवी का प्राकट्य हुआ। तथा उन्हीं गायत्री देवी से सम्पूंर्ण वेद प्रकट हुए तथा वेदों से 36 करोड़ देवी देवताओं और उनके सात करोड़ मन्त्र और उपमन्त्र निकले उन-उन मन्त्रों से भिन्न-भिन्न कार्यों की सिद्धि होती है। परन्तु इस प्रणव सहित पंचाक्षर मन्त्र ”ऊँ नमः शिवाय“ से सम्पूर्ण मनोरथों सहित भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।

देवी ने कहा -ः महादेव ! यह प्रणव मन्त्र क्या है? इसका भेद क्या है। मनुष्य को एकाक्षर मन्त्र, पंचाक्षर मन्त्र अथवा षडाक्षर मन्त्र में से किसका जप करना चाहिये और क्यों?

महादेवजी बोले -ः देवि ! प्रणव और प्रथम अक्षर ‘‘ऊँ‘‘ एक सिक्के के दो पहलू हैं, ‘प्र’ नाम है प्रकृति से उत्पन्न संसार रूपी महासागर का ‘प्रणव’ इस महासागर से पार करने के लिये नाव का कार्य करता है। इसलिये इस ऊँ कार को प्रणव की संज्ञा दी जाती है। देवि ! यह प्रणव मन्त्र इस के उपासकों को बलपूर्वक मोक्ष तक पहुँचा देता है। इस प्रणव मन्त्र के दो भेद हैं।

(1) सूक्ष्म                 (2) स्थूल

एक अक्षर रूप जो ‘ऊँ’ है उसे सूक्ष्म प्रणव कहते हैं तथा पाँच अक्षर वाले नमः शिवाय मन्त्र को स्थूल प्रणव कहते हैं। अतः मेरे भक्त को षडाक्षर मन्त्र (प्रणव सहित पंचाक्षर) का जप ही करना चाहिये । क्योंकि 108 करोड़ ऊँ नमः शिवाय मन्त्र जप करने के पश्चात् ही साधक को एक अक्षर वाले प्रणव मन्त्र ‘ऊँ’ का जप करना चाहिये। 108 करोड़ ऊँ नमः शिवाय मन्त्र जप करके ही मनुष्य जीवनमुक्त अवस्था में पहुँच सकता है। देवि ! थोड़े भेद के साथ यह तुम्हारा भी मूलमन्त्र है। ‘‘नमः शिवाय’’ के स्थान में ‘‘नमः शिवायै‘‘ कहने से यह देवी आपका मूल मन्त्र हो जाता है।

पार्वती जी बोलीं -ः हे देवाधिदेव महादेव ! 108 करोड़ ऊँ नमः शिवाय मन्त्र जप से आपका क्या आशय है? कृपया विस्तार पूर्वक बतावे।

महादेवजी बोले -ः देवि ! ऊँ नमः शिवाय मन्त्र का कम से कम 108 करोड़ जप मनुष्य के लिये मोक्ष प्राप्ति हेतु आवश्यक है, क्योंकि सर्वप्रथम नौ करोड़ ”ऊँ नमः शिवाय“ मन्त्र का जप करने से मनुष्य का शरीर शुद्ध हो जाता है, फिर नौ करोड़ मन्त्र जप से वह पृथ्वी तत्व पर विजय प्राप्त कर लेता है, फिर नौ करोड़ मन्त्र जप से वह जल तत्व पर विजय पाता है, तदनन्तर फिर नौ करोड़ का जप करके वह अग्नि तत्व को अपने अधिकार में कर लेता है, पुनः नौ करोड़ का जप करके वायु तत्व पर विजयी होता है। तत्पश्चात पुनः नौ करोड़ का जप करके वह आकाश तत्व पर विजय पाता है। इसी प्रकार नौ-नौ करोड़ ”ऊँ नमः शिवाय“ मन्त्र का जप करके वह क्रमशः गंध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द पर विजय पाता है। इसके बाद फिर नौ करोड़ का जप करके अहंकार को भी जीत लेता है। इस प्रकार 108 करोड़ प्रणव सहित पंचाक्षर मन्त्र ”ऊँ नमः शिवाय“ का जप करके उत्कृष्ट बोध को प्राप्त हुआ पुरूष शुद्ध योग से युक्त होकर जीवन मुक्त हो जाता है। देवि ! ”ऊँ नमः शिवाय“ मन्त्र का जप एवं मेरा ध्यान करते समय समाधि में स्थित हुऐ पुरूष को साक्षात् मेरा ही स्वरूप जानना चाहिये ।
पार्वती जी बोलीं -ः हे महादेव ! कलिकाल में मनुष्य की आयु अत्यन्त अल्प है ऐसे में वह 108 करोड़ ‘‘ऊँ नमः शिवाय” मन्त्र का जप किस प्रकार पूर्ण कर आपका सामीप्य प्राप्त कर सकता है।

महादेवजी बोले -ः देवि ! कलिकाल में मेरे द्वारा जप कर्म में माला व स्थान का चयन कर भक्त इस 108 करोड़ मन्त्र जप के लक्ष्य को बड़ी सरलता से प्राप्त कर सकता है। जैसे अँगुली से गणना करते हुए जप करना जहाँ एक गुना फलदायक होता है। वहीं शंख के मनकों से सौ गुना, मूँगों की माला से हजार गुना, स्फटिक की माला से दस हजार गुना, मोतियों की माला से लाख गुना, पद्माक्ष से दस लाख गुना, सुवर्ण के बने मनकों की माला से करोड़ गुना और रुद्राक्ष की माला से किया हुआ जप अनन्त गुना फलदायक होता है।
देवि ! इसी प्रकार घर में किए हुए जप का फल एक गुना, गौशाला में उसका फल सौ गुना, पवित्र वन या उद्यान में सहस्त्र गुना, देवालय में कोटि गुना और मेरे निकट किया गया जप अनन्त गुना फलदायक होता है। लिखकर किया गया जप घर में किये गये वाचिक जप से सौ गुना अधिक फलदायक होता है। इसी प्रकार मेरा भक्त माला व स्थान का चयन कर क्रोध को वश में करके इसी जन्म में भोग सहित मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है।

पार्वती जी बोलीं -ः देवाधिदेव महादेव !आपने लिखकर किये गये जप को घर में किये गये वाचिक जप से 100 गुना अधिक फलदायक माना है। कृपा कर इसका विस्तार पूर्वक वर्णन कीजिये।

महादेवजी बोले -ः देवि ! यह प्रणव सहित जो पंचाक्षर मन्त्र है यही मेरे निष्कल और सकल रूप का प्रथम लिंग है। और इसका पूजन ही जप कहलाता है। देवि ! इस पृथ्वी पर मैं पाँच प्रकार के लिंगों से प्रतिष्ठित हूँ। प्रथम स्वयम्भू लिंग द्वितीय बिन्दु लिंग तृतीय प्रतिष्ठित लिंग चतुर्थ चर लिंग और पाँचवाँ गुरू लिंग । इनमें से जो द्वितीय बिन्दु लिंग है यह हाथ से लिखा हुआ मेरा ‘‘ ऊँ नमः शिवाय ‘‘ मन्त्र ही है, देवि ! जिस घर में मेरे पंचाक्षर मन्त्र का लिखित और वाचिक जप होता है, उस घर से मैं कभी दूर नहीं रहता। ‘‘ऊँ नमः शिवाय‘‘ मन्त्र के लेखन में लगा हुआ मेरा भक्त स्वयं ही ऐश्वर्य प्राप्त कर लेता है। और इसके लगातार अभ्यास से उसको ज्ञान की प्राप्ति के साथ-साथ मोक्ष भी प्राप्त हो जाता है। इसमें संदेह नहीं है।

पार्वती जी बोलीं -ः महादेव ! ‘‘ऊँ नमः शिवाय’’ मन्त्र जप के समय आपके भक्त को किस प्रकार ध्यान व जप करना चाहिये?

महादेवजी बोले -ः देवि ! ऊँ नमः शिवाय मन्त्र जप के समय मन में इस प्रकार ध्यान लाना चाहिये कि कल्याणदाता भगवान् शिव कमल के आसन पर विराजमान हैं उनका मस्तक श्री गंगाजी तथा चन्द्रमा की कला से सुशोभित है, उनकी बाँई जाँघ पर आदि शक्ति भगवती उमा आप बैठी हैं। वहाँ खडे़ हुए बड़े-बड़े प्रमथ गण भगवान् शिव की शोभा बढ़ा रहे हैं। वे शिव अपने चार हाथों में मृगमुद्रा, टंक, वर तथा अभय की मुद्राएँ धारण किये हुए हैं। इस प्रकार सदा सब पर अनुग्रह करने वाले सदाशिव का बारम्बार स्मरण करते हुए हृदय में मानसिक पूजा करके फिर पूर्वाभिमुख हो ”ऊँ नमः शिवाय“ मन्त्र का जप करना चाहिये ।
देवि ! जप कर्म में अँगूठे को मोक्षदायक, तर्जनी अँगुली को शत्रु नाशक, मध्यमा को धनदायक, और अनामिका को शान्तिदायक माना जाता है। कनिष्ठिका अँगुली जप के फल को नष्ट करने वाली मानी गयी है। अतः भोग और मोक्ष दोनों के लिये दूसरी अँगुलियों के साथ अँगुष्ठ द्वारा जप करना चाहिये क्योंकि अँगुष्ठ के बिना किया हुआ जप निष्फल होता है। देवि! मेरा जो भक्त केवल मोक्ष ही चाहता है, उसे अनामिका अँगुली पर माला रखकर अँगुष्ठ से जप करना चाहिये।
पार्वती जी बोलीं -ः हे देवाधिदेव महादेव ! कलिकाल में मनुष्य शारीरिक एवं मानसिक रोगों से ग्रसित होकर अल्पायु होगा, काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार से पीड़ित होगा अतः क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे उसकी इस कलयुग के प्रभाव से रक्षा हो सके।

महादेवजी बोले -ः सुन्दरि ! तुमने यह बहुत ठीक बात पूछी है, अभी तक मैंने इस विषय को गोपनीय समझकर प्रकट नहीं किया था। अब इसका उत्तर सुनो। देवि ! यह चराचर जगत् हम दोनों से उत्पन्न होने के कारण शाक्त एवं शैव है। इसलिये किसी भी धर्म, जाति, सम्प्रदाय को मानने वाली स्त्री जो मुझमें और तुममें आस्था रखने वाली है। यदि गर्भधारण के सम्पूर्ण काल में प्रातः उठते समय एवं रात्रि काल में सोने के पूर्व मेरे इस प्रणव सहित पंचाक्षर मन्त्र ‘‘ ऊँ नमः शिवाय‘‘ का मानसिक जप (अर्थात् बिना होठ एवं जिव्हा हिलाये)) करे तथा जन्म के समय से लेकर शिशु को जब-जब स्तन पान कराये पंचाक्षर मन्त्र का मानसिक जप करती रहे तो निःसंदेह उसका बालक बृहस्पति के समान बुद्धिमान, सूर्य के समान तेजस्वी, समुद्र के समान गम्भीर, चन्द्र के समान शीतल एवं हाथियों से समान बलशाली होकर अपने परिवार एवं कुल को तारने वाला होगा।

अधिक कहने से क्या लाभ संक्षेप में देवि ! जिसके हृदय में ”ऊँ नमः शिवाय“ षड़ाक्षर मन्त्र प्रतिष्ठत है। उसे दूसरे बहुसंख्यक मन्त्रों और अनेक विस्तृत शास्त्रों से कोई प्रयोजन नहीं है। जिसनें ”ऊँ नमः शिवाय“ इस मन्त्र का जप दृढ़ता पूर्वक अपना लिया है, उसनें सम्पूर्ण शास्त्र पढ़ लिये और समस्त शुभ कृत्यों का अनुष्ठान पूरा कर लिया ऐसा समझना चाहिये ”ऊँ नमः शिवाय“ मन्त्र के जप में लगा हुआ मनुष्य यदि पण्डित, मूर्ख, पतित, हीन, अन्त्यज अथवा अधर्मी हो तो भी वह पाप पंजर से मुक्त हो जाता है।

किसी भी अवस्था में पड़ा हुआ मनुष्य यदि मुझ (शिव) में उत्तम भक्ति भाव रखता हुआ ”ऊँ नमः शिवाय“ मन्त्र का जप करता है तो यह मन्त्र निःसंदेह सिद्ध होता ही है। इस मन्त्र के लिये लग्न,तिथि,नक्षत्र,वार और योग आदि का विचार अपेक्षित नहीं है। यह मन्त्र कभी सुप्त नहीं होता, सदा जाग्रत ही रहता है। यह महामन्त्र कभी किसी का शत्रु नहीं होता, जब यह मन्त्र सिद्ध गुरू से प्राप्त होता है तो सुसिद्ध कहलाता है। जब असिद्ध गुरू से प्राप्त होता है तो सिद्ध कहलाता है। और जब परम्परा से प्राप्त होता है तो, साध्य कहलाता है। इस प्रकार ”ऊँ नमः शिवाय“ मन्त्र मनुष्य को किसी भी प्रकार से प्राप्त क्यां न हो सिद्ध होकर ही रहता है। इसमें संशय नहीं है। अतः साधकों को चाहिये कि दूसरे मन्त्रों को त्याग कर इस ”ऊँ नमः शिवाय“ मन्त्र का आश्रय लें क्योंकि दूसरे मन्त्रों के सिद्ध हो जाने से यह मन्त्र सिद्ध नहीं होता परन्तु इस महामन्त्र के सिद्ध हो जाने पर वे दूसरे सब मन्त्र अवश्य सिद्ध हो जाते हैं। जिस प्रकार अन्य देवताओं के प्राप्त होने पर भी मैं (शिव) प्राप्त नहीं होता परन्तु मेरे (शिव) प्राप्त हो जाने पर वे सब देवता प्राप्त हो जाते हैं।

देवी पार्वती ने कहा -ः हे देवाधिदेव महादेव ! आप अपने अंगों एवं गले में सदैव रुद्राक्ष को धारण किये रहते हैं, कृपा कर इस रुद्राक्ष की महिमा को बताते हुए सविस्तार वर्णन कीजिये।

महादेव बोले -ः देवि महेश्वरी शिवे ! मैं तुम्हारे प्रेमवश भक्तों के हित की कामना से रुद्राक्ष की महिमा का वर्णन करता हूँ। महेशानि ! रुद्राक्ष मुझे बहुत ही प्रिय है। इसे परम पावन समझना चाहिये। रुद्राक्ष के दर्शन, स्पर्श तथा उस पर जप करने से वह समस्त पापों का अपहरण करने वाला है। महेश्वरि शिवे ! पूर्वकाल की बात है, एक बार मैं मन को संयम में रखकर हजारों दिव्य वर्षों तक समाधि में रहा। घोर समाधि के दौरान एक दिन मैंने लीलावश अपने दोनों नेत्र खोले, नेत्र खुलते ही मेरे मनोहर नेत्रपुटों से कुछ जल की बूँदें गिरी। उसी से रुद्राक्ष नामक वृक्ष उत्पन्न हो गया। रुद्राक्ष के वृक्ष से प्राप्त रुद्राक्ष को सर्वप्रथम मैंने धारण किया फिर वे रुद्राक्ष मैंने विष्णु भक्तों को तथा चार वर्णों के लोगों में बाँट दिये। हे देवि शिवा! ये उत्तम रुद्राक्ष असह पाप समूह का भेदन करने वाले तथा श्रुतियों के भी प्रेरक हैं। भोग और मोक्ष की इच्छा रखने वाले चार वर्णों और विशेषतः शिव भक्तों को मेरी और तुम्हारी प्रसन्नता के लिये रुद्राक्ष को अवश्य धारण करना चाहिये।

देवि ! मनुष्य के जीवन में तीन एषणाएँ होती हैं, प्रथम- प्राण एषणा, द्वितीय- लोक एषणा और तृतीय- धन एषणा। ये तीनों एषणाएँ रुद्राक्ष के धारण करनेसे पूर्ण होती हैं। रुद्राक्ष चारों पुरूषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने में समर्थ है। मनुष्य के लिये स्वास्थ्य, आयुष्य, मेघा, प्रतिभा शक्ति, सुन्दरता, ऋद्धि-सिद्धि से लेकर धन पुत्र और परम पद की प्राप्ति रुद्राक्ष के धारण करनेसे प्राप्त होती है। आठों सिद्धि व नवों निधियों का सुख रुद्राक्ष के धारण से प्राप्त होता है।

देवी शिवे ! रुद्राक्ष अकाल मृत्युहारी है। रुद्राक्ष धारण करने से स्त्रियों को अवश्य पुत्र-लाभ होता है, रुद्राक्ष धारण करने वाले को भूत-प्रेत, पिशाच, डाकिनी, शाकिनी आदि से होने वाली बाधाओं से छुटकारा मिल जाता है। देवि ! रुद्राक्ष का नाम लेने मात्र से दस गायों के दान करने, रुद्राक्ष का दर्शन और स्पर्श करने से बीस गायों को दान करने एवं धारण करने से सौ गायों के दान करने का पुण्य प्राप्त होता है। बिना रुद्राक्ष धारण किये जो व्यक्ति वैदिक कर्मों को तथा जप होम आदि कर्मों को करता है, वह सब व्यर्थ जाता है। उसको कुछ भी पुण्य प्राप्त नहीं होता। रुद्राक्ष को जैसे भी पहना जाये मन्त्र से अभिमन्त्रित करके या बिना अभिमन्त्रित किये, श्रद्धा भाव से या बिना श्रद्धा भाव से, भक्ति या अभक्ति से, लज्जा से या बिना लज्जा से अर्थात् जैसे भी चाहे रुद्राक्ष को जो भी व्यक्ति धारण करता है, वह सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो भली प्रकार ज्ञान को प्राप्त करता है।

देवि ! जो व्यक्ति 108 मनकों की रुद्राक्ष की माला धारण करते हैं, उनको क्षण-क्षण में अश्ववेघ यज्ञ का फल प्राप्त होता है। तथा वह अपने इक्कीस कुलों का उद्धार कर शिवलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।
देवि ! जो चारों वेद और पुराणों के पाठ का फल है, तीर्थ और सब प्रकार की विद्याओं का फल है, वह रुद्राक्ष धारण करने से मिलता है। प्रयाण के समय यदि कोई रुद्राक्ष धारण करके मर जाय तो वह फिर जन्म को प्राप्त न होकर रुद्रलोक को गमन करता है। कण्ठ और भुजा में यदि रुद्राक्ष धारण कर मृत्यु हो जाये तो इक्कीस कुल तारकर रुद्रलोक में निवास करता है। देवि ! रुद्राक्ष मेरा प्रसाद और साक्षात् मेरा ही स्वरूप है। इसे धारण करने वाला व्यक्ति सदा सुखी, निरोगी, प्रसन्न और आलस्य रहित रहता है। इसका मुख्य कार्य तो मानव जीवन को पूर्णता प्रदान कर मोक्ष तक पहुँचाना है। अतः इसे हर जाति, धर्म, सम्प्रदाय के स्त्री-पुरूषों को अवश्य धारण करना चाहिये।

शिव-पार्वती सम्वाद समाप्त

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